बेबाक विचार, KP Singh (Bhind)

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bebakvichar, KP Singh (Bhind)


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जल व्यापारियों की चुनौती

Posted On: 26 Nov, 2013  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

के पी जी आपका सोचना बिलकुल सही है लेकिन पहले तो आप स्वयं लिख रहे हैं की अमेरिका ने भारतीय मूल के लोगों को ऊंची ऊंची कुर्सी देकर जिम्मेदारी में उन्हें भी भागीदार बना दिया है, फिर ऐसे ही सारे विश्व के लोगों का संयुक्त संगठन ही अमेरिका है ! अमेरिका में आकर भारतीय मूल के लोग जो तीन चार लाख के करीब तो न्यू यार्क और न्यू जर्सी में ही है, सारे अमेरिका में कितने होंगे कहा नहीं जा सकता , फिर अमेरिका ने अफगानिस्तान में हस्तक्षेप किया ईराक में सद्दाम की सता समाप्त की, अब इसकी नजर इरान पर है क्या इसमें हम भारतीयों की भागीदारी नहीं है क्यों भारतीय नेता दिग्विजय( आजकल अमेरिका में है) जैसे नेता यहाँ आकर अपनी राजनीति चमकाने की कोशीश करते हैं ? हम दूसरों को दोष तो दे देते हैं पर अपने अन्दर नहीं देख पाते हैं ! फिर भी नयी सोच के लिए साभार ! हरेन्द्र जागते रहो !

के द्वारा: harirawat harirawat

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मुलायम ने अभी तक धैर्य धारण किया तो मात्र इसलिए कि उन्हें मुसलमानों को इतना निरीह बनाकर छोड़ना था कि वे उनके किसी प्रतिकूल कदम पर आंखें तरेरना तो दूर असहमति व्यक्त करने लायक भी नहीं बचें और अंततोगत्वा उन्होंने इस मुकाम को पा लिया तो अब असली मकसद को पूरा करना उनका ध्येय है। लोहिया की वंशवाद विरोधी परम्परा को सींचने में उनका योगदान हो या फिल्म स्टारों के जरिए चुनाव जीतने की पूंजीवादी कवायद अथवा अपने गांव में सरकारी खर्चे पर शाही जश्न, उनके खाते में इतना कुछ जमा है कि हिंदुस्तान के अलावा कोई देश ऐसा नहीं हो सकता बहुत से लोग सच को कहने में झिझकते हैं लेकिन आपने बहुत सटीक , और समय के हिसाब से अपना लेखन दिया है ! जानकारी भरा लेखन ! बहुत सही

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश ) डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश )

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के द्वारा: bhanuprakashsharma bhanuprakashsharma

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तात्कालिक घटना पर अच्छा प्रतिक्रियात्मक आलेख; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! "केजरीवाल ने निशाना सही जगह लगाया है और इस समय सफेदपोश बुद्धिजीवी वर्ग उनके साथ भी है, लेकिन फिर भी रिलायंस इंडस्ट्रीज का बाल बांका हो पाएगा, इसमें संदेह है। वजह यह है कि इस देश की जनचेतना न्याय और ईमानदारी के पक्ष में नहीं है। हर निर्णायक मौके पर यह बात साबित होती रही है। यहां के अगुआकार वर्ग की निगाह में सही का प्रतिमान क्या है और गलत का क्या, इसका निष्कर्ष निकालना बड़ा मुश्किल काम है। इस कारण आने वाले मोड़ पर उसे कैसा फैसला लेना पड़ जाए, कोई नहीं कह सकता। आज केजरीवाल के कहने से जिस रिलायंस इंडस्ट्रीज को वह शैतान का दूसरा अवतार बता रहे हों कल उनको वही रिलायंस इंडस्ट्रीज देवदूत नजर आने लगे जो सामाजिक न्याय के दैत्य को पराजित करने के लिए दैवीय अवतार बनकर प्रकट हुआ है। अगर ऐसी उलटवासी होती है तो इसमें कोई आश्चर्य न होगा।"

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

के द्वारा: bebakvichar, KP Singh (Bhind) bebakvichar, KP Singh (Bhind)

मुलायम सिंह ने भी समाजवाद के नाम का पेटेंट अपना लिया। अब वे जो करें वही समाजवाद है भाड़ में जाएं लोहिया और भाड़ में जाएं आचार्य नरेंद्रदेव। एक समाजवादी चंद्रशेखर थे जो स्वर्ग सिधार गए, जिनका समाजवाद अपनी जाति के अहंकार के उत्थान और बिहार के तत्कालीन माफिया सूरजदेव सिंह से सुर्खरू हुआ, अब मुलायम सिंह हैं, जिनका समाजवाद पहले महामहिम अमर सिंह द्वारा इंद्रसभा यानी फिल्मी दुनिया की अल्प वस्त्रधारिणी नायिकाओं और नायकों के सुशोभित होने से धन्य होता था। आज भी अमिताभ बच्चन उनके समाजवाद के एक नगीने बने हुए हैं। वे उनके पिता डॉ. हरवंश राय बच्चन के भी बहुत मुरीद हैं। हालांकि, मैंने कभी यह नहीं सुना कि हरवंश राय बच्चन की इमेज समाजवादी कवि या जनकवि के रूप में रही हो, लेकिन बकौल मुलायम सिंह बाबा नागार्जुन को याद करना जरूरी नहीं है। अगर समाजवाद के सिद्धांतों पर खरा उतरना है तो हरवंश राय बच्चन की मधुशाला पढ़ो और उसी पर अमल करो। हाथी के दांत दिखाने के लग होते हैं सिंह साब , समाजवाद नहीं परिवारवाद !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

जाहिर सी बात है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे ज्यादा कारगर मंत्र व्यवस्था में पारदर्शिता लाना है और तकनीकी क्रांति ने इसका अवसर काफी हद तक सुलभ करा दिया है, लेकिन तकनीक पर मनुष्य निर्भर हो जाए यानी वह तकनीक के आगे स्वयं को बौना मानकर अकर्मण्यता ओढ़ ले तो यह तो सृष्टि में सभी जीवों के बीच मनुष्य की स्थापित महानता के विरुद्ध आचरण होगा, लेकिन उसे जो करना है वह चंद चेहरों को बेनकाब कर मस्त हो जाने से नहीं होगा। असल जिंदगी न तो खबरों का व्यापार करने वाली मीडिया की दुनिया है न ही कोई अमिताभ बच्चन की फिल्म है, कि एक चिह्नित खलनायक को खत्म कर दिया और सुधर गई व्यवस्था। बदलाव का रास्ता बेहद कठिन है और उसके लिए गहरी समझदारी व दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत है। श्री सिंह साब आपने लेख में बहुत कुछ कहा है और ये भी की जो लोग भ्रष्टाचार की लड़ाई लड़ रहे हैं अगर उनके काले कारनामे निकले जायें तो वो भी हम्माम में नंगे पाए जायेंगे ! लेकिन किसकी बात कर रहे हैं आप ? आपने लेखन में पहेली तो दे दी लेकिन नाम नहीं लिखा , पता तो चले की ऐसा इस समय में कौन है ! आपको निर्भीक लेखक समझता हूँ जो सत्य को सत्य कहे , फिर ये नाम छुपाने की बात क्यूँ ?

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

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पीताम्बर जी प्रतिक्रिया के लिए आभार.... ... ... . .. वैसे मैं आपको बता दूं कि मैं पुलिस से कतई नहीं हूं और न ही मेरा कोई ऐसा इरादा है। आपकी बात सही है कि जो जिस रूप में दिखेगा उसी रूप में उसकी पहचान बनेगी परंतु इसके अंदरूनी कारणों को भी जानना पड़ेगा कि आखिर ऐसा किस वजह से हो रहा है। २४ घंटे की नौकरी करने के बाद अगर बिजली, पानी की समस्या को नियंत्रित करने के लिए पुलिस जिम्मेदार होती है तब इसमें पुलिसकर्मी कहां से दोषी हो जाता है। जब तक हर विंग अलग नहीं होगी तब तक कैसे काम चलेगा। ऐसे में कुछ बदलाव जरूरी हैं। रही बात अखिलेश यादव की तो वे कब-कैसे दिखेंगे यह तो भविष्य के गर्त में है परंतु अभी ऐसा नहीं कहा जा सकता कि वे काफी सुधारवादी दिख रहे हों। बिजली की समस्या हर जिले में हैं, यहां तक जिला मुख्यालयों पर ही १० घंटे भी आपूर्ति नहीं हो रही है। अब लोग आंकड़ों पर कैसे यकीन कर लें क्योंकि अगर इतनी समस्या थी तब पूर्ववर्ती सरकार के दौरान इतनी दिक्कत लोगों को क्यों नहीं हुई। ऐसे तमाम सवाल अब जनमानस में उपजने लगे हैं। छह माह की सरकार पर उनके पिता ने सर्टीफिकेट भले ही अच्छा दिया हो परंतु जनता शायद ऐसा देने में अभी अचकचा जाए। साभार.....

के द्वारा: bebakvichar, KP Singh (Bhind) bebakvichar, KP Singh (Bhind)

अनर्थ होने के आयाम दूसरे हैं। भोगवाद की पराकाष्ठा, भावनाओं को पूर्ण तिलांजलि, जीवन के प्रति आत्मकेंद्रित दृष्टिकोण यह प्रवृत्तियां पहले से बदतर जंगल युग के दौर में लौटा देने का काम कर रही हैं। अन्ना की गलती यह थी कि उन्होंने तथाकथित आधुनिकतावादियों के समर्थन को अपनी पूंजी समझा जबकि आधुनिकता मानी यह है कि आप इतना स्मार्ट हों कि अपनी अंतरात्मा के खिलाफ व्यूह रचना को खारिज कर वास्तविक रूप से हितकर एक नया रास्ता इसके लिये ईजाद कर सकें। सिंह साहब, अत्यंत सही ही लिखा है आपने। आज जातिवाद का जो जहर बताया जाता है वही कुछ लोगों के लिए अमृत बन गया है परंतु इसे सच्चे अर्थों में नहीं स्वीकारना चाहिए क्योंकि जब तक भोगवादी तृष्णाएं व्याप्त रहेंगी तब तक समाज में एकरूपता की बात करना भी बेमानी होगी। इस बारे में सभी लोगों को सोचना ही पड़ेगा.....

के द्वारा: aleem aleem

जून में गेहूं की सरकारी खरीद जब 1285 रुपये प्रति कुंटल की दर से हो रही थी तो किसान अपना अनाज बेचने के लिये मरने मारने पर उतारू थे। वजह यह थी कि खुले बाजार में कोई गेहूं का एक हजार रुपये कुंटल का भाव देने को भी तैयार नहीं था। गेहूं इफरात में पैदा हुआ है इस कारण तब से बाजार की स्थितियां अभी भी नहीं बदलीं लेकिन इसका भाव पिछले कुछ सप्ताह से आसमान की ओर दौड़ रहा है। लोग दिसंबर तक दो हजार रुपये कुंटल का भाव पार हो जाने का अनुमान लगा रहे हैं। गेहूं नहीं हर वस्तु की यही हालत है। मूल्य प्रणाली में मांग और उत्पादन का तार्किक आधार अर्थहीन हो गया। सटोरियों की मुट्ठी में हो गया है बाजार जुआ का ऐसा बोलबाला अपने आध्यात्मिक संस्कार हमारे अंदर जीवित रहते तो हमें कदापि स्वीकार्य नहीं हो सकता था। हजारों वर्षों से इंद्रिय निग्रह और अपरिग्रह को हमने अपने जीवन का आदर्श माना है। एक दिन में हम इसे कैसे भुला सकते हैं। दूसरी ओर बाजार कहता है कि उपभोगवाद अर्थव्यवस्था की संजीवनी है। बहुत सही लिखा है आपने ! अन्न पैदा करने वाले को ही अन्न के लिए मोहताज़ हो जाना पड़ेगा ! सार्थक लेखन

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय के० पी० जी, जिस तरह आपने हिंदी को देशी-विदेशी शासन, व्यापार तथा हमारे विकास के मुद्दों से साथ जोड़ा है, यह वाकई प्रेरणात्मक है, हिंदी को मातृभाषा और राष्ट्रभाषा के रूप में न अपनाने का कारण वही भेदभाव है जो भारतीय समाज में प्राचीन काल से विद्यमान है तथा अंग्रेजों द्वारा इसमें और बढ़ोत्तरी कर दी गयी! आज शासक वर्ग के स्वार्थ के चलते हिंदी भाषा तथा अन्य क्षेत्रों में भी भारतीय समाज के स्थिति दयनीय होती चली जा रही है! हम और आप तो हिंदी लिखने और बोलने में सक्षम हैं लेकिन हमारी आने वाली पीढ़ी शायद टूटी-फूटी हिंदी बोल सके लेकिन वह इसे पढने में बिलकुल असमर्थ होगी! वोट का लालच छोड़ शासक वर्ग को उपयुक्त कदम उठाने चाहिए ठाठ आज जनता को भी भी घर में सदा हिंदी भाषा के शुद्ध प्रयोग पर ध्यान देना चाहिए! मेरे द्वारा आरक्षण पर लिखे गए इस लेख पर आपकी प्रतिक्रिया ज़रूर चाहूँगा http://panditsameerkhan.jagranjunction.com/2012/09/11/aarakshan/

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

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के पी भाई सब........ मेरे पास इस स्थान को लेकर जो जानकारी है वो में बता रहा हु इसका मतलब ये नही के में आप के लेख में कोई टीका टिप्पणी कर रहा हूँ । में आप के लेख को साधू वाद कहता हूँ के आप ने जनपद जालौन के उस स्थान का उल्लेख अपने ब्लॉग पर किया जो लोगो कि सोच से लुप्त हो रहा है । तंत्र साधना केंद्र के रूप में इस स्थान को कोई नही जानता था देवीय प्रेरणा से श्री लंका से एक साधू यहाँ पधारे जिनका नाम जगन्नाथ दास था । इन्होने इस स्थान को जागृत किया आज भी यह तंत्र साधना का एक बड़ा केंद्र है क्यों की तंत्र में वे स्थान अति महत्वपूर्ण कहे जाते है जिनमे देवी के स्थान के साथ श्मशान भी हो। चुकि लंका महाराज अब नही रहे तो इस स्थान कि जाग्रति भी धीरे धीरे समाप्त हो गयी अब ये महेज एक पिकनिक स्पाट बन कर रह गया है ।

के द्वारा: aleem aleem

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आदरणीय के० पी० जी, आपके लेख में सत्य के कई अंश हैं और ये मुस्लिम धर्म की अच्छाइयों को प्रकट करते हैं, किन्तु देखिये न आपने शुक्रवार को ये लेख लिखा और कई मुस्लिम उपद्रवियों ने जुमे की अलविदा नमाज़ अदा करने के बाद लखनऊ, कानपुर, इलाहबाद जैसे कई शहरों में निर्दोष हिन्दू औरतों और बच्चों पर ज़ुल्म शुरू कर दिया, कई औरतों को कपडे फाड़ दिए गए.....अगर किसी हिंसा के विरोध में अन्य निर्दोष लोगों को प्रताड़ित करना ही जिहाद है तो मैं इस जिहाद के खिलाफ हूँ.....कट्टरपंथी सभी धर्मो में मिल जायेंगे लेकिन इस्लाम ने जिस कट्टरता का प्रदर्शन आज तक किया है उससे मेरे मन में बहुत क्षोभ है....किसी भी कट्टरपंथी का समर्थन मैं नहीं कर सकता....

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

सिंह साहब, जिस तरह के इस्लाम तथा मुसलमान की आप बात कर रहें हैं वैसा तो मुझे आज तक नजर नहीं आया। तो क्या मैं इसका अर्थ यह निकालूँ कि यहाँ न तो कोई सच्चा मुसलमान है और न ही इस्लाम। हाँ  इस्लाम का अपभ्रंश जरूर है। आपने जो इस्लाम की व्याख्या की है मुझे बहुत ही अच्छी लगी है। किन्तु इसका दूसरा पक्ष भी है। इस संबंध में मैंने कुछ दोहे लिखे हैं। कृपया उन्हें भी पढ़ें। नीचे लिंक दे रहा हूँ। आपकी तरह मैं भी अपने आपको किसी धर्म विशेष से बँधा हुआ महसूस नहीं करता। मैं सभी धर्मों में अच्छाईयों से अधिक बुराईंयाँ पाता हूँ। हो सकता है मेरी नजर का धोखा हो। मैं ऐसे खुदा को क्यों मानूँ? http://dineshaastik.jagranjunction.com/2012/07/13/%E0%A4%B9%E0%A4%AE-%E0%A4%90%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%96%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%82/

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के द्वारा: D33P D33P

आचार्य जी, आपने मेरे ब्लॉग का मैसेज सही रूप में ग्रहण किया। आदमी के अंदर नफरत और प्रेम, दूसरों को स्वतंत्रता दिलाना और कभी दूसरों पर आधिपत्य कायम करने की कुटिल इच्छा को चरितार्थ करना, यह विरोधी भावनाएं एक साथ काम करती रहती हैं। जिनकी मानवीय विशेषताओं में सकारात्मक आस्था है वे जानते हैं कि जो लोग इतिहास की किन्हीं परिस्थितियों में कुरीतियों के संवाहक बन जाते हैं एक दिन वही लोग समाज को सही रास्ता दिखाने के लिए भी आगे आते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि सामाजिक न्याय की वकालत करते हुए भी विभिन्न समुदायों के बीच एकता और सद्भाव की जो नजीरें कायम की गई हैं उनको बहुत उत्साह के साथ आगे रखा जाए, ताकि सभी के सहयोग और समर्थन से सही परिवर्तन को अंजाम दिया जा सके। साभार.........

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भरोदिया जी, आपकी प्रतिक्रिया का उत्तर देने में देरी नेटवर्क प्रॉब्लम की वजह से हुई। सबसे पहले तो आपको धन्यवाद कि आपने मेरा ब्लॉग पढ़ा और मनोयोग से पढ़ा। इसके बाद मुझे आपकी प्रतिक्रिया भी बेहद पसंद आई। अंग्रेजों का साथ देने वाले राजे-महाराजाओं के बारे में आप जैसी दो टूक राय रखने वाले लोग हों तो भावी इतिहास में कोई विदेशी शक्ति देश में आधिपत्य करने में सफल हो ही नहीं सकती, लेकिन मैं देखता हूं कि लगभग सारे राजनीतिक दल जिनमें समाजवादी विचारधारा तक की पार्टियां शामिल हैं, अंग्रेजों के वफादार रहे राजवंशों के वर्तमान उत्तराधिकारियों को सिर माथे बैठाने में हिचक महसूस नहीं कर रहे। दरअसल जनता का एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो एक तरफ तो देशभक्ति की भी दुहाई देता है दूसरी तरफ अपनी जाति से सम्बंधित होने के कारण अंग्रेजों के समय की रियासतों के प्रति अपने समर्पण का संवरण भी नहीं कर पाता। आजादी के बाद भी राजाओं के महिमामंडित होने की यही वजह है। देश में जनता की मानसिकता भ्रम और दोहरेपन का शिकार रही है, जिसका नतीजा है कि देश आज तक आगे बढ़ने की एक सही दिशा तलाश नहीं कर पाया है। आप जैसे लोग इस मामले में विरले ही हैं जिनकी प्रतिबद्धता अकाट्य है और देश के मामले में तेवर जेहादी। मेरी कामना है कि आपका अनुकरण हो और आप जैसे लोगों का कारवां आगे बढ़े। धन्यवाद......

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K. P. जी, वाकई मुग़ल शाशक धार्मिक रूप से उतने कट्टर नहीं थे जितने की अन्य मुस्लिम आक्रमणकारी और अकबर तो इन सबमे महान थे, तत्समय हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मों ने एक-दुसरे से बहुत कुछ ग्रहण किया, भारतीय समाज में पर्दा प्रथा मुस्लिम धर्म की देन है और स्त्रियों की अवनति का मुख्य काल मध्य काल ही रहा है क्योंकि हिन्दू धर्म ने बहुत सी ऐसी प्रथाएं मुस्लिम धर्म से ग्रहण कर ली थीं जो स्त्री स्वतंत्रता के खिलाफ थीं...इसके बावजूद इनमे धार्मिक भेद-भाव उतना अधिक नहीं था जितना की आज भी कभी-कभी देखने को मिल जाता है, यहाँ तक की मुहम्मद अली जिन्ना प्रारम्भ में भारतीय राष्ट्र भक्त थे किन्तु बाद में अंग्रेजों की नीति के शिकार होकर पाकिस्तान के समर्थक हो गए.....पिछले कुछ दिनों में उत्तर प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में हिन्दू-मुस्लिम दंगों की कुछ घटनाओं का घटना फिर हमें शर्मसार कर रहा है... ऐसे में आपका यह लेख शायद कुछ लोगों की ऑंखें खोलने का काम कर सके

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

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चम्बल में दस्यु समस्या एक समय काफी रही है और केपी सिंह साहब आपने सही लिखा है अब यहां पर बागी परम्परा की बजाय विशुद्ध से अपराधी ही पनप रहे हैं और ऐसे में अपराधियों को महिमामंडित करने की जरूरत है। मैंने स्वयं इस मुद्दे पर काफी बीहड़ का भ्रमण किया है और इस दौरान मैंने पाया कि जिस समय बागी परम्परा के डकैत होते थे उस समय पुलिस के भी कुछ उसूल हुआ करते थे  परंतु अब पुलिस भी जिस परम्परा पर उतर आईहै उसमें बागी नहीं विशुद्ध अपराधी ही पनपेंगे क्योंकि बेकसूरों को फांसने का अभियान चलाने के बाद जब उन्हें अपराधी बनाकर मुठभेड़ में मार गिराया जाएगा तो बागी नहीं विशुद्ध अपराधी ही पनपेंगे। पिछले तीन दशकों गिरोह के सरदार को मारकर या पकड़ने के बाद बाकी गिरोह के सदस्यों को तलाशने का पुलिस ने प्रयास नहीं किया जबकि यही सदस्य डकैती को अपना आदर्श मानकर बीहड़ में चले जाते हैं और नासूर बन जाते हैं।

के द्वारा: aleem aleem

(सिंह साहब जनता की अदालत में हाजिर हों वकील साहब के पोस्ट पर कमेंट शायद जागरण जंक्शन की ओर से बंद किए गए हैं, इसलिए उसकी प्रतिक्रिया इस पर देने के साथ ही जागरण जंक्शन से अनुरोध है कि वे इस गड़बड़ी को दुरुस्त करें) अधिवक्ता न्याय दिलाने में सीढ़ी की तरह काम करते हैं परंतु जब ये ही स्वयं कानून को तोड़ने पर आमादा हो जाएं तब कानून का सम्मान कौन करेगा? निश्चित रूप से काला कोट पहनने वालों में से कुछ लोग इस कोट की महत्ता नहीं समझ रहे हैं और कलंकित करने का काम कर रहे हैं। इस दिशा में न्यायपालिका को सोचना चाहिए, क्योंकि जब अन्य मामलों को स्वतः संज्ञान में लेने में न्यायविद पीछे नहीं रहते तब अपने ही कोर्ट के बाहर हो रही घटनाओं से वे अंजान क्यों बने रहते हैं। सिंह साहब आपने सवाल उठाया है। इसका उत्तर अधिवक्ताओं को देना ही पड़ेगा।

के द्वारा: jalaun jalaun

के द्वारा: bebakvichar, KP Singh (Bhind) bebakvichar, KP Singh (Bhind)

आदरणीय सिंह साहब सादर नमस्कार, आपने अर्जुनसिंह जी के बारे में विस्तार से लिखा है. आज मध्यप्रदेश में झुग्गी झोपड़ी के मालिकाना हक़ के कारण और रिक्शा चालकों को रिक्शा मालिक बनाने में भी अर्जुनसिंह जी का ही हाथ था. दोनों ही योजनाएं सही तरीके से लागू ना होने से शहर में झुग्गियों की बाढ़ आ गयी. वैसे सुना है झुग्गियां देने के पीछे भी बंधुआ मजदूरों को रोकने की चाल थी और सायकिल रिक्शा भी बहुतायत में रीवा क्षेत्र के लोग ही चला रहे हैं इस लिए यह उनके हित में योजना बनायी गयी थी. विधुत मंडल से बीडी पत्ता मजदूरों के लिए भुगतान की रकम उधर लेकर वापस ना चुकाना जिससे कालान्तार में विधुत मंडल अपनी साख खो कर कंपनी में बंट गए यह दुर्भाग्यपूर्ण कार्य किया है. कांग्रेस से नाराज हो कर एक अलग पार्टी बनाना उनको पूरी तरह ले डूबा.

के द्वारा: akraktale akraktale

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के द्वारा: bebakvichar bebakvichar

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मनमोहन सिंह पर शायद बढ़ती उम्र का असर आ गया है। कभी वित्त के जानकार माने जाने वाले मनमोहन अब सुध-बुध खो बैठे हैं। उन्हें कोई परवाह नहीं रही। कड़े कदम उठाने की बात कहकर वे केवल जनता पर ही कोढ़े चलाने का काम कर रहे हैं। रुपया हो या जनता सब उनके कार्यकाल में रसातल में जा रहा है और अब इसकी जिम्मेदारी लेने की बजाय मनमोहन सिंह वैश्विक नीतियों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। काश उन्होंने गांधीजी के ही ग्रामीण स्व रोजगार के फार्मूले को विकसित किया होता तो शायद इतने लोग बेरोजगारी और महंगाई से न जूझते, लेकिन विदेशी कंपनियों के एजेंट बने बैठे मनमोहन सिहं को यह बात कहां समझ आती है। वैसे भी सोनिया जी के आर्शीवाद के लिए देशी नहीं विदेशियों को खुश करना जरूरी जो है।

के द्वारा: hftyogesh hftyogesh




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