बेबाक विचार, KP Singh (Bhind)

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सीआईए के एजेंट नहीं थे कांशीराम

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उत्तर प्रदेश के सरकारी कार्यालयों से संविधान निर्माता बाबा साहब डा. भीमराव अंबेडकर का चित्र अघोषित तौर पर हटवा दिया गया है। उनकी वैधानिक स्थिति और देश में नागरिक समाज के निर्माण में उनके वैचारिक योगदान को देखते हुये यह नहीं होना चाहिये था। समाजवादी पार्टी ने यह भी ध्यान नहीं रखा था कि वर्ण व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई के अधूरे चक्र को पूर्णता प्रदान करने के लिये 1956 में उसके प्रेरणा पुरुष महान समाजवादी विचारक डा. राममनोहर लोहिया चुनावी गठबंधन संभव बनाने को बाबा साहब से मिले थे। दोनों के बीच सकारात्मक सहमति हुयी थी। अगर अचानक बाबा साहब का निधन न हो गया होता तो 1957 में दोनों महापुरुषों की पार्टियां मिलकर चुनाव लड़ी होतीं।

कांशीराम को डा. अंबेडकर जैसी सर्वमान्यता अभी भी भले ही न मिल पायी हो लेकिन सामाजिक परिवर्तन के लिये हुये संघर्षों का इतिहास देश में तब तक पूरा नहीं कहा जा सकता जब तक कांशीराम के योगदान का अध्याय उसमें न जुड़ा हो।

अजातशत्रु से बड़ा धोखेबाज दूसरा कोई नहीं हो सकता, इस कारण किसी के विवादित होने का मतलब यह नहीं होता कि वह गलत ही हो। कौन सही आदमी है इसका सबसे बड़ा पैमाना यह है कि वह कितना विवादित हुआ। कांशीराम तो बहुत विवादित हैं क्योंकि उन्हें वर्ण व्यवस्था से लाभान्वित पूरा तबका अपना वर्ग शत्रु मानता है। समाजवादी पार्टी वोटों की सफल सौदागर है। उसके हिसाब किताब में यह बात जाहिर है कि उसे अनुसूचित जातियों के वोट बसपा का वर्चस्व रहते मिल नहीं सकते। ऐसी हालत में कांशीराम को जो सबसे बड़ा खलनायक समझता है उस सामान्य वर्ग का दिल जीतने के लिये कांशीराम को अपमानित करना उसकी मजबूरी है। अनेक योजनाओं से कांशीराम का नाम हटाने के साथ उरई के राजकीय एलोपैथिक अस्पताल को उनसे छुटकारा दिलाने का सपा सरकार का कदम इसी मजबूरी का नतीजा है। यहां कांशीराम का नाम जोडऩे, घटाने की राजनीति का विश्लेषण करने से सरोकार नहीं है। अलबत्ता इस बहाने यह चर्चा करना प्रासंगिक हो जाता है कि कांशीराम को महापुरुषों की कोटि में माना जाये या नहीं।

एक ऐसा तबका जो बेजुबान था और जो प्रतिकार की संज्ञा से तमाम जोर जुल्म के बावजूद शून्य हो चुका था उसमें कांशीराम ने अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे का मंत्र सिद्ध किया। इस मुर्दा तबके में साहस और निर्भीकता का संचार करना परिस्थितियों को देखते हुये असंभव सा कार्य था लेकिन कांशीराम के प्रयासों से ऐसा हुआ। यह उनके असाधारण व्यक्तित्व होने का प्रमाण था। जब मैं होश संभाल रहा था मैंने कांशीराम के बारे में कई बातें सुनी थीं। यह प्रचार था कि सीआईए उन्हें भारत में गृह युद्ध छिड़वाने के लिये मोटी रकम देती है। दलितों को वर्ग शत्रु समझने वाले समाज में पैदा होने के कारण मुझे भी शुरूआत में इन अफवाहों में यकीन था और मैं उन्हें बेहद नफरत की निगाह से देखता था। इसके बाद चर्चायें शुरू हुईं कि कभी साइकिल चलाकर कभी और तरीके से चंदा बटोरने के लिये दलितों के बीच भटकने वाले कांशीराम को बिना फाइव स्टार होटल के बेड के नींद नहीं आती। दिल्ली में वे दिन भर दलितों के बीच रहते हैं और रात में गुलछर्रे उड़ाते हैं।

जब कांशीराम पहली बार हेलीकाप्टर से चुनाव प्रचार के लिये निकले तो मानो इन सारी निंदाओं की पुष्टि हो गयी। यह दूसरी बात है कालांतर में मेरी धारणा कांशीराम के बारे में बदलती गयी। जैसे-जैसे मैं अपनी वर्ग चेतना से उबरा वैसे-वैसे कांशीराम की अच्छाइयों की पहचान मुझे होती रही। कांशीराम के कई फैसलों से मैं उतना ही सहमत हूं जितना उनसे नफरत करने वाले लोग लेकिन इसके बावजूद उन्हें महापुरुष के रूप में स्वीकारने में मुझे कोई हिचक नहीं है। खास तौर से जब मैं कांशीराम के त्याग के बारे में सोचता हूं तो कायल हो जाता हूं। जिन कांशीराम की इतनी विलासी छवि पेश की जाती थी वे एक सादा सी हाफ शर्ट और पैंट में रहते थे, उनका खाना भी बहुत सादा था। बोलचाल जरूर ठेठ थी लेकिन इरादा स्पष्ट था।

कांशीराम ने मिशन की सफलता के लिये जिन कुर्बानियों को जरूरी माना उन्हें अपने जीवन में ईमानदारी से उतारा। उन्होंने पार्टी के एक पैसे का खर्च अपने शौक या अपने परिवार के लिये नहीं किया। मिशन से भटक न जायें इसलिये परिवार न बढ़ाने की प्रतिज्ञा का भी अंत तक पालन किया। कांशीराम सीआईए के एजेंट थे यह छद्म कितना झूठा था आज एकदम उजागर है। कांशीराम की निजी जीवन में कुर्बानियों के चलते ही उनमें ऐसा तेज पैदा हुआ कि उनकी अगुवाई में दलित शक्ति का लोहा समाज के शक्तिशाली तबकों को मानना पड़ा। दलित संघर्ष के इतिहास में बाबा साहब मैन ऑफ आइडिया हैं तो कांशीराम मैन ऑफ एक्शन।

कांशीराम में कुछ व्यक्तिगत कमजोरियां न होतीं तो 1993 में जिस सपा बसपा गठबंधन को उन्होंने कराया था वह पूरे देश में आमूल चूल परिवर्तन का कारण बनता। 1995 में वे स्वविवेक से काम नहीं कर सके जिससे यह गठबंधन टूटा। गेस्ट हाउस कांड को भाजपा के तत्कालीन सेनापति ब्रह्मïदत्त द्विवेदी और उनके शागिर्द मीडिया वालों की साजिश से बहुत ही बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया। अगर गठबंधन चलता तो वर्ण व्यवस्था का अस्तित्व समाप्त हो जाता लेकिन इसके चलते सपा बसपा के बीच कभी न मिटने वाली खाई पैदा हो जाने के कारण यह खतरा हमेशा के लिये टल गया। अब तो नयी आर्थिक नीति ही समाज के सड़े गले ढांचे को बदलने का काम कर सकती है और कर भी रही है।

कांशीराम के नजदीक जब मायावती नहीं होती थीं तो वे बाद में भी इस गठबंधन को लेकर सही आंकलन करने में चूक नहीं करते थे। 1996 में स्थानीय निकाय के चुनाव के समय उन्होंने एक रात उरई में गुजारी थी। अगले दिन सुबह मुझे उनसे प्रेस कांफ्रेंस में बात करने का मौका मिला और उसमें साफ झलका कि मुलायम सिंह के प्रति उनका लगाव खत्म नहीं हुआ है। यह दूसरी बात है कि जीवन के अंत तक वे सपा बसपा गठबंधन की टूटी कडिय़ां जोडऩे का काम नहीं कर पाये लेकिन मुलायम सिंह स्वयं इस बात को जानते होंगे कि उन्होंने वैचारिक स्तर पर उनके प्रति हमदर्दी की लौ कभी नहीं बुझने दी थी। फिर भी वे कांशीराम का नाम और उनकी याद को मिटाना कबूल कर रहे हैं ऐसा क्यों।



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santlal Karun के द्वारा
October 2, 2012

आदरणीय के.पी. सिंह जी, आप का लेख अत्यंत बेबाक और संजीदा है, तथ्य के बेहद करीब भी, पढ़कर बड़ा संतोष हुआ | हार्दिक साधुवाद !

yogi sarswat के द्वारा
October 1, 2012

श्री के पी सिंह जी आपका लेखन बहुत कुछ स्पष्ट कर देता है ! ये बिलकुल सही बात है की डॉ. आंबेडकर के बाद अगर दलित वर्ग को किसी ने सम्मान दिलाया तो वो कशी राम ही थे ! लेकिन एक बात पर मुझे संशय है ! आपने गेस्ट हाउस काण्ड में ब्रह्म दत्त दिवेदी का नाम लिया है जबकि हम कुछ और ही जानते हैं की मायावती को सपा के गुंडों से लाल जी टंडन ने बचाया था ! ये विरोधाबास है या कुछ और ?’

    bebakvichar, KP Singh (Bhind) के द्वारा
    October 3, 2012

    योगीजी, प्रतिक्रिया के लिए आभार। वैसे मैं इसको लेकर बाद में लिखूंगा तब स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगी।


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