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पचनद की धरा पर पल्लवित हुआ आयुर्वेद

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कार्तिक पूर्णिमा पर विशेष

पचनद का नयनाभिराम दृश्य।

पचनद का नयनाभिराम दृश्य।

जालौन जनपद में पांच नदियों (सिंध, क्वांरी, यमुना, पहुज और सिंध) का संगम स्थल पचनद विशिष्ट स्थान रखता है। इसके साथ ही कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाला मेला भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस मेले को लेकर वैसे कई धार्मिक मान्यताएं लम्बे समय से प्रचलित हैं परंतु प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. देवेंद्र कुमार सिंह ने इस मेले का सम्बंध आयुर्वेद से जोड़ा है। जब उन्होंने अन्वेषण शुरू किया तो पता चला कि पचनद मेले का इतिहास संत तुलसीदास के समय से ही नहीं है। डॉ. देवेंद्र के अनुसार आज से हजारों वर्ष पूर्व यह स्थान आयुर्वेद के शोध के लिए विख्यात रहा है। मानव शरीर, जिसके बिना कोई भी धर्म, नियम निभने असम्भव हैं, की रक्षा का एकमात्र साधन आयुर्वेद है। जिस पर वेदों के संहिता काल से ही गम्भीर विचार होते रहे हैं। कहा जाता है कि आयुर्वेदिक सिद्धांतों का उपदेश ब्रह्मा ने प्रजापति को, प्रजापति ने अश्विनी कुमारों को, अश्विनी कुमारों ने इंद्र को और इंद्र ने भरद्वाज को दिया। कश्यप संहिता के अनुसार अत्रि ने इंद्र से ज्ञान प्राप्त करके उसे अपने पुत्रों और शिष्यों को दिया, जिससे आयुर्वेद की यह परम्परा आत्रेय पर्यंत आ सकी।

अत्रि अपने आश्रम चित्रकूट में आयुर्वेद की शिक्षा देते थे मगर उन्होंने अपने पुत्र आत्रेय-पुनर्वस को अपने मित्र वामदेव के आश्रम (आधुनिक बांदा) में शिक्षा के लिए भेजा, जहां उन्होंने आयुर्वेद की शिक्षा प्राप्त की। फिर आचार्य आत्रेय पुनर्वस काम्पिल्य (पांचाल राज्य आधुनिक फर्रुखाबाद, इटावा, मैनपुरी) चिकित्सा विद्यालय में आयुर्वेद के आचार्य बने। आत्रेय-पुनर्वसु के बारे में कहा जाता है कि वे अपने साथ आयुर्वेद-निष्णात मुनियों को लेकर जंगलों में औषधियों एवं वनस्पतियों के शोध के लिए परिभ्रमण करते रहते थे। उनके छह शिष्य थे- अग्निवेश, छारपाणि, हरीत, पराशर, भेड़ और जतूकर्ण।

आत्रेय ने अपने तीन शिष्यों पाराशर, भेड़ और जतूकर्ण को इस क्षेत्र (आधुनिक जालौन जिला) में आयुर्वेद के शोध के लिए भेजा, क्योंकि यहां के जंगलों में वनस्पतियों की भरमार थी। पराशर ने बेतवा नदी के किनारे (आधुनिक परासन गांव) अपना आश्रम स्थापित किया और शोध के बाद पाराशर संहिता की रचना की। उनके योग्य पुत्र व्यास ने इस पर और शोध करके यजुर्वेद की रचना करके संसार की बड़ी सेवा की। आचार्य भेड़ ने जालौन के पास अपना आश्रम स्थापित किया और शोध में लग गए। उनकी रचित भेंड़ संहिता आयुर्वेद का महत्वपूर्ण ग्रंथ है। जहां पर उनका आश्रम था वह स्थान अब भेंड़ गांव के नाम से पहचाना जाता है, लेकिन वहां के निवासी है अब नहीं जानते हैं कि गांव का नाम भेंड़ क्यों है।

मेले के दौरान पचनद किनारे बैठे श्रद्धालु।

मेले के दौरान पचनद किनारे बैठे श्रद्धालु।

जतूकर्ण ने पचनदा के पास (वर्तमान में जगम्मनपुर) अपना शोध केंद्र स्थापित किया। जहां पर उनका शोध केंद्र था। वह स्थान उनके नाम जतूकर्ण के कारण कर्णखेड़ा के नाम से जाना जाता था। फिर बिगड़ कर कनार खेड़ा कहा जाने लगा। कहा गया है कि किसी राजा कर्ण ने बसाया था मगर वास्तविकता यही है कि आयुर्वेदाचार्य जतूकर्ण के कारण ही इस स्थल का नाम कर्णखेड़ा पड़ा था। उनकी शोध रचना जतूकर्ण-काय. चिकित्सा है। उनका कोई योग्य शिष्य नहीं था अत: अन्वेषक अन्य स्थानों को प्रयाण कर गये। प्रारम्भिक आयुर्वेद मुख्यत: काष्ठौषधियों पर निर्भर था, जो यहां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थी, परंतु पतंजलि, नागार्जुन के काल में इसमें धातुओं, रसायनों का उपयोग होने लगा। इस कारण यहां के संस्थान बंद हो गये।

इस समय तक आयुर्वेद का ज्ञान पूरे भारतवर्ष में फैल चुका था। फिर चरक का युग आया। इसको आयुर्वेदी का स्वर्णिम काल कहा जा सकता है। चरक ईसा से लगभग 200 वर्ष पूर्व अवतरित हुए थे। चरक ने जतूकर्ण और भेड़ के सहपाठी अग्निवेश द्वारा लिखित अग्निवेश तंत्र के प्रतिसंस्कार पर कार्य शुरू किया जो चरक संहिता के नाम से प्रसिद्ध है। चरक अभी आधा ग्रंथ (तेरह अध्याय) ही लिख पाए थे कि उनकी मृत्यु हो गई।

चरक के बाद लगभग दो सौ पचास वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद जनपद जालौन के पचनदा में दृढ़बल का जन्म होता है। जिन्होंने अग्निवेश, भेड़, जतूकर्ण के काम को आगे बढ़ाते हुए चरक संहिता के वे अध्याय जिनको चरक पूरा नहीं कर पाए थे, में 41 अध्याय और जोड़कर पूरा किया।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से दृढ़बल के बारे में सूचना उनके लेखन से ही प्राप्त होती है। उनके पिता का नाम कपिलबल था और वे पचनदा के रहने वाले थे। चरक संहिता में मिलता है-

विस्तारयति लेशोक्तं संक्षिपत्याति विस्तरम्।

संस्कत्र्ता कुहते तंत्र पुराणं च पुनर्नवम्॥

अतस्तंत्रोत्तम मिदं चरकेणाति बुद्धिना।

संस्कृतं तंतु संसुष्टं विभागे नोपालभ्यते॥

इदमन्यून शब्दार्थ तंत्र दो विवार्जितम्।

अखंडार्थ दृढ़बलो जात: पंजनदपुरे॥

सप्तदशौषधाध्याय सिद्धकल्पैरपूरयत-. सिद्धि 12/76-79

हजारों वर्ष में जब शुद्ध वायु, जल, देश तथा काल विकृत हो जाते हैं, तब विभिन्न प्रकृति के मानवों का देह, आहार, बल, मन, अवस्था समान होने पर भी एक साथ एक ही समय एक ही रोग से नगरों और जनपदों का देखते-देखते विनाश हो जाता है। औषधियां अपने स्वभावगत गुणों को छोड़कर विकृत हो जाती हैं। उनके स्पर्श तथा सेवन से नगर का विनाश हो जाता है। कुछ ऐसा ही जतूकर्ण के कर्णखेड़ा के साथ भी हुआ। पचनदा भी गर्त में चला गया। केवल पांच नदियां ही वहां पर रह गईं।

लेकिन समय फिर बदला। दसनामी संन्यासियों की दस शाखाएं होती हैं। जैसे गिरि, पुरी, सरस्वती, आरण्य, तार्थ आदि। इसी संप्रदाय की एक शाखा वन भी है, जो लगभग एक हजार वर्ष पूर्व इस जनपद में आती है और उत्तर में यमुना नदी के किनारे अपनी पीठ स्थापित करती है। उसी पीठ के एक संत ने पचनदा को फिर उसका पुराना वैभव वापस दिलवाने के लिए पीठ को कंजौसा (पचनदा) ले गए। किसी को सोचने और कहने से ही किसी जगह को आसानी से महत्व नहीं मिलता। एक कहावत है बनिया बांधे बाजार नहीं लगता। तुलसीदास और पीठ के महंत मंजूवन के मिलन की घटना को धर्म से जोडऩे पर कड़ी मिल जाती है। दोनों ही धार्मिक व्यक्ति थे।

इस विशाल देश में मेलों का अपना अलग महत्व है और ये मेले धर्म से जुड़े हैं। स्थान विशेष पर स्नान, ध्यान, देवपूजन और देवीदर्शन से जुड़े हैं। क्या आश्चर्य दोनों मुनियों की राय-सलाह से यहां पर मेला लगना शुरू हुआ? क्या मेले का रोग, स्वास्थ्य रक्षा से कोई सम्बंध है? क्या जतूकर्ण के आयुर्वेद आश्रम का कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव किसी रूप में परिलक्षित है? डॉ. देवेंद्र कुमार सिंह इसको लेकर सकारात्मक सोच रखते हुए कहते हैं कि यह मेला कार्तिक माह में लगता है और स्कंदपुराण के वैष्णवखंड में कार्तिक के लिए कहा गया है-

रोगापहं पातनाख कृत्परं सद्बुद्धिदं पुत्रधनादिसाधकम्।

मुक्तेनिदानं नहि कार्तिकव्रताद विष्णुप्रियादन्यादिहास्ति भूतले॥

इस मास को जहां रोगापह अर्थात् रोगविनाशक कहा गया है, वहीं सद्बुद्धि प्रदान करने वाला, लक्ष्मी का साधक तथा मुक्ति प्राप्त कराने में सहायक बताय गया है। यहां शनि से पीडि़त, सूर्य से पीडि़त, प्रेतबाधा से पीड़ित व्यक्ति आकर व्याधि से मुक्ति पाने की प्रार्थना कर जाने-अनजाने में जतूकर्ण के आयुर्वेद आश्रम की याद दिलाता है।



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

mayankkumar के द्वारा
December 3, 2012

आपका लेख पढ़ वाकई दिल प्रसन्न हुआ ……. सधन्यवाद ……. आपकी कलम में कोई बात ज़रूर है ….. !!!!! सधन्यवाद !!

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
November 29, 2012

मान्यवर के.पी. सिंह जी, सादर अभिवादन !….. आप और आप के आलेख दोनों ही सामान्य से विल्कुल हटकर होते हैं ! आयुर्वेद की महनीय महिमा के साथ -साथ तपोनिष्ठ आचार्यों की एक लम्बी परंपरा से अवगत कराया ! बहुत -बहुत आभार !

    bebakvichar, KP Singh (Bhind) के द्वारा
    December 4, 2012

    आचार्यजी, आपके इस स्नेहमयी प्रोत्साहन हेतु सादर आभार…

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
November 28, 2012

भाई साहब बहुत ही अच्छी प्रस्तुति उत्तम प्रक्रति के लिये व अच्छी जानकारी के लिये ,बधाई ,,,,,,,,,,,,इस मास को जहां रोगापह अर्थात् रोगविनाशक कहा गया है, वहीं सद्बुद्धि प्रदान करने वाला, लक्ष्मी का साधक तथा मुक्ति प्राप्त कराने में सहायक बताय गया है।


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