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अब तो सट्टा और ठगी ही युग धर्म

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क्रिकेट में सट्टा का मामला एक बार फिर पुलिस की पकड़ में आ गया है। ऐसा नहीं है कि इस देश की व्यवस्था इतनी भोली हो कि उसे इसके पहले यह पता न रहा हो कि क्रिकेट में एक खेल मैदान में होता है तो दूसरा नेपथ्य में चलता है। अजहरुद्दीन का तो मामला कई बरस पहले उस समय पकड़ा गया था जब वे क्रिकेट की दुनिया के स्टार थे। कहा तो यह जाता है कि जरायम की दुनिया में कोई भी पत्ता पुलिस की जानकारी के बिना नहीं खड़क पाता। इसलिये सही बात यह है कि क्रिकेट में पहले दिन से ही जिम्मेदारों को सट्टे के चलन की बात मालूम थी पर पुलिस ही नहीं राजनीतिक तंत्र तक को इसमें डिवेंचर मिलता है। जिसकी वजह से सबने इस विष बेल को पोसा है।
आश्चर्य की बात यह है कि जिस देश में राष्ट भक्ति की दुहाई देते लोग न थकते हों, वहां किसी की और चीजों में कटिबद्ध निष्ठा तो दूर की बात है देशप्रेम तक लोगों में नहीं है। क्रिकेट का खेल देश में इस कदर कैसे हावी हो गया यह मुद्दा यहां के लोगांे के राष्टीय स्वाभिमान से जुड़ा है। अगर अपने देश के मान की परवाह लोगों में होती तो क्रिकेट आजादी के बाद कभी का देश से बेदखल हो जाता। आजादी के समय तो क्रिकेट का जोर हाकी फुटबाल के मुकाबले कमजोर था लेकिन हाल के वर्षों में क्रिकेट का जुनून लोगों में चरम सीमा पार कर गया क्योंकि अन्य खेलों के नामी खिलाडि़यों को तो कैरियर ढलान पर आते ही फाकाकशी की नौबत से बचने के लिये अपने मैडल बाजार मंे बेच डालने की नौबत आ जाती है जबकि क्रिकेट में बस एक अन्तर्राष्टीय मैच खेलने का अवसर मिल जाये तो समझो आने वाली सात पीढि़यों का उद्धार हो गया। पूछने पर कहा यह जायेगा कि चूंकि क्रिकेट बड़े लोगों की पसन्द का खेल है जिसकी वजह से क्रिकेट में धन की बरसात होती है लेकिन यह एक अधूरा सच है। पहले हाकी व फुटबाल के लिये भी लोगों में भारी दीवानगी रहती थी पर इनके खिलाडि़यों पर कभी किस्मत की ऐसी मेहरबानी नहीं हुई। जाहिर है कि क्रिकेट में कुबेर का खजाना मिलने का रहस्य दूसरा ही है। क्रिकेट में ग्लैमर तब बढ़ा जब यह खेल सट्टेबाजों की गिरफत में चला गया।
लेकिन बात हो रही थी राष्टीय स्वाभिमान की। क्रिकेट का खेल केवल उन देशों में खेला जाता है जो ब्रिटेन के उपनिवेश रहे हैं। गुलाकी निशानी आजादी के बाद भी ढोना गवारा किया गया यह अचरज की बात है। दूसरी बात यह है कि किसी देश में खेलों का चुनाव और उनकी वरीयता आम लोगों की सेहत की दृष्टि से उपयोगिता के आधार पर तय होती है। क्रिकेट हमेशा ठंडे रहने वाले मुल्कों के लिये शरीर में गर्मी बनाये रखने की जरुरत हो सकती है लेकिन भारत जैसे देश में जहां क्वथनांक की हद तक गर्मी पड़ती हो क्रिकेट के खेल का औचित्य क्या है। आज हर गांव गली में क्रिकेट खेला जा रहा है। क्रिकेट से करोड़पति अरबपति केवल 100-150 खिलाड़ी बनते होंगे लेकिन तपती दोपहर में दीवानगी के शिकार वे बच्चे जो क्रिकेट के कैरियर में जगह बनाने में सक्षम नहीं हैं उन्हें इससे अपनी शारीरिक और मानसिक सेहत बिगाड़ने के अलावा कुछ हासिल नहीं हो सकता। चीन की तरह भारत से भी क्रिकेट को बाहर कर जिम्नास्ट के लिये लोगों को प्रेरित करने की खेल नीति अपनायी जानी चाहिये थी। इससे पेशेवर खिलाडि़यों का ही नहीं हर नौजवान का फायदा होता क्योंकि इसका अभ्यास पूरी नस्ल को मजबूत करता पर उधार के दिमाग से काम करने वाले इस देश में यह होना संभव नहीं था।
आज अखबारों में छप रहा है कि आईपीएल से दाऊद ताकतवर हो रहा है लेकिन सही बात यह है कि दाऊद इब्राहीम के बारे में पहले दिन से ही यह बात खुलासा है कि वह केवल तस्करी करके इतना धनाढ्य नहीं हो सकता था। उसने क्रिकेट पर सट्टा खिलवाने की शुरुआत की और इतनी दौलत बटोर ली कि मुम्बई में बम विस्फोट कराकर भारत जैसी बड़ी ताकत को चुनौती देने का दुस्साहस कर डाला। इसके बावजूद क्रिकेट से तौबा नहीं किया जा सका जबकि इस बीच देशभक्ति का पेटेन्ट हासिल पार्टी भी हुकूमत में काबिज होने का मौका पा गयी थी। आधुनिक बाजार व्यवस्था सट्टा, जुआ, बेईमानी, ठगी और हर तरह की अनैतिकता की व्यवस्था है जिनमें जमीर है वे प्राचीन आध्यात्मिक सभ्यतायें उसको स्वीकार नहीं कर रहीं लेकिन आरोपित व्यवस्थायें भारत में यहां के लोगांे के बेगैरत होने से सहज में ही स्वीकार हो जाती हैं। यह लानत का विषय है फिर भी यहां किसी को शर्म नहीं आती। दुनिया में कोई कौम जो सिर्फ अपने फायदे और लालच के लिये ही जीती है कभी सिर उठाकर नहीं चल सकती। भारत के लोगों के चरित्र के इस दोष की वजह से ही इस देश को इतने लम्बे समय तक गुलामी के शिकन्जे में रहना पड़ा। आज विशालता और संसाधन दोनों ही दृष्टि से यह देश प्रचंड शक्ति है फिर भी पिछलग्गू बने रहना इसकी नियति है। अगर अपने कमिटमेन्ट के लिये किसी की जान लेना या अपनी जान दे देने का साहस देश के लोगों मंे आ जाये तो देश का ही नहीं सारी दुनिया का ही नक्शा बदल सकता है। पूरी दुनिया आज मौजूदा व्यवस्था के विकल्पों की तलाश में है और इसके लिये जरूरत है मानवीय और नैतिक मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता देने वाली प्रणाली में नया रास्ता खोजने की जो कि एक तरह से अपनी जड़ों की ओर लौटने का सफर भी है। क्रिकेट ही नहीं वे सभी चीजें जो इसके सांचे में फिट नहीं होतीं उन्हें सलाम कह दिया जाना चाहिये क्या यह पहल हो पायेगी।



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bhagwanbabu के द्वारा
May 27, 2013

जबरदस्त… प्रस्तुतिकरण…. बहुत ही विचारणीय… तथ्य रखा है आपने…. बधाई..


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