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निश की ओर बढ़ते अखबार

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आधुनिक व्यवसायिक पत्रकारिता कई युगों का सफर तय कर चुकी है। टाइम्स ऑफ इंडिया की सवा सौवीं वर्षगांठ १९९० के अरीब-करीब मनाई गई थी, उस समय ब्रिटेन के गार्जियन आदि प्रमुख अखबारों के सम्पादक टाइम्स इंक्लेव में संबोधित करने आए थे। ब्रिटेन के ही एक प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय दैनिक के सम्पादक ने कहा था कि अगर कोई अखबार मुनाफे में नहीं है तो उसके सम्पादक की स्वतंत्रता का कोई मतलब नहीं है। इस पर काफी नाक-भौं सिकोड़ी गई थीं, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ। १९९५ के अरीब-करीब नवभारत टाइम्स के पहले पन्ने पर एक बॉटम स्टोरी छपी, जिसका सार यह था कि अमुक कोल्ड ड्रिंक कम्पनी की व्यवसायिक रणनीति से देश के ढाबों का लुक बदल जाने के कारण आधुनिकीकरण से कितनी तेजी से राष्ट्रीय समाज को जोड़ा जा सका है। इसी के बाद समीर जैन बैनेट कोलमिन एंड कम्पनी के नये उत्तराधिकारी बने और एक दिन उन्होंने अपनी कम्पनी के तमाम हिंदी प्रकाशनों के सम्पादकों की बैठक बुलाकर कहा कि मुझे हर प्रकाशन फायदे में चाहिए। इसके लिए आम पाठक की बजाय हम लोग निश को यानी उन पाठकों को टार्गेट करें जो उपभोक्ता सामान खरीदने में सक्षम हों ताकि हमें बड़ी कम्पनियों के विज्ञापन मिल सकें।
इसकी बड़ी आलोचना हुई, लेकिन कालांतर में क्षेत्रीय दर्जे की मीडिया कम्पनियां भी बड़े स्तर पर उभरीं और उन्होंने भी इसी रणनीति पर अमल किया। हालांकि, इसके बाद बाजार का दृष्टिकोण बदला और यह स्थापित हुआ कि अगर गरीबी की रेखा से नीचे लाने वालों को भी उपभोक्ता संस्कृति के दायरे में लाने के लिए सुनियोजित ढंग से रणनीति बनाई जाए तो बाजार उनसे भी उनका पेट काटकर पैसा खींच सकता है। इसी रणनीति के तहत अखबारों ने बीपीएल के हितों से जुड़ी खबरों का प्रकाशन करके उन्हें अखबार पढ़ने का चस्का लगाया, लेकिन पिछले दो वर्षों से स्थिति बदली है। अखबारी कागज की कीमतें बढ़ने से जितने में अखबार बिक रहा है उससे चार गुना ज्यादा भुगतान प्रिंट मीडिया की कम्पनियों को अखबार की प्रति कॉपी में करना पड़ रहा है।
दूसरी ओर सरकार के अनुदान समाप्ति के जुनून के कारण बीपीएल तो छोड़िए निम्न मध्यवर्गीय परिवार की भी अतिरिक्त आय समाप्त हो चुकी है, जिससे उसकी क्रय शक्ति समाप्त हो जाने के कारण बाजार को उससे कोई लगाव नहीं रह गया। अखबार का सर्कुलेशन का ब्रेक-अप जब बनाया जाता है तो इनकम वार विश्लेषण निजी विज्ञापन कम्पनियां मांगती हैं और क्रय शक्ति से विहीन पाठकों को वे प्रसार संख्या के आंकड़ों से रद्द करने लगी हैं। नतीजतन अखबारी कम्पनियों का दृष्टिकोण बदल रहा है। अब वे ज्यादा सर्कुलेशन बढ़ाने के बजाय बैनेट एंड कोलमैन कम्पनी के पूर्व के दृष्टिकोण की तरह केवल निश पाठकों को टार्गेट करना चाहते हैं। उनकी यह मंशा कम वेतन पर प्रतिभाहीन लोगों को सम्पादक बनाकर रखे गये दलालों की समझ में समय रहते नहीं आ पा रही, जिसके कारण बस्तियों का हालचाल छापने के नाम पर वे उन मलिन इलाकों के लोगों की फोटो सहित समस्याएं छापने में अखबार के पन्ने काले कर रहे हैं, जिनसे विज्ञापन कम्पनियां चिढ़ती हैं। इस बीच बैनेट कोलमैन एंड कम्पनी ने अपनी रणनीति बदली है। उसने जब एमआरपीटीसी एक्ट लागू था तब जनसेवक प्राइवेट लि. कम्पनी बनाकर लखनऊ नवभारत टाइम्स का प्रकाशन शुरू किया था। बाद में इसे बंद कर दिया गया था। अब वह फिर लखनऊ से इसका प्रकाशन शुरू करने जा रहा है। इसमें भरतुल खबरों की बजाय वास्तव में पढ़ी जा सकने वाली खबरों को स्थान देने की रणनीति बनाई गयी है। जिलों के लिए तीन-चार पन्ने तय कर उल्लू के पट्ठेनुमा बिना पढ़े-लिखे रिपोर्टरों और उन्हें गाइड करने वाले दलाल सम्पादकों के हिसाब से स्पेस देने की बजाय नवभारत टाइम्स में सीमित स्पेस दिया जायेगा और सिलेक्टेड खबरें ही छपेंगी। यानी नवभारत टाइम्स फिर निश पाठकों के लिए छपेगा और वे पाठक चेतना संपन्न होंगे जिनमें पर्याप्त क्रय क्षमता होगी, जिनकी संख्या के आधार पर विज्ञापन कम्पनियां भी नवभारत टाइम्स को ज्यादा महत्व देंगी। यह अकेले नवभारत टाइम्स की बात नहीं है। बाजार की नब्ज पहचानने वाले कई छोटे अखबारी ग्रुप भी इस रणनीति का महत्व समझ रहे हैं और उन पर अमल कर रहे हैं, जिससे चंद दिनों के लिए समाचारपत्र व्यापार की दुनिया में अपने को बादशाह मान बैठी कम्पनियों के कर्ताधर्ताओं के नीचे की जमीन खिसक रही है और वे मान रहे हैं कि गैर दूरंदेशी मैनेजरों व सम्पादकों की बदौलत उनकी लुटिया डूबने के आसार पैदा होने लगे हैं।



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